गीता की रचना कब हुई ?

गीता की रचना कब हुई ?

गीता, जिसे श्रीमद़भगवदगीता भी कहा जाता है, की रचना कब हुई, यह सवाल मेरे ही नहीं, आपके भी मन में आता होगा। जिस रूप मे आज गीता है, उसे सुनने या कहने के लिए चार से लेकर पांच घंटे तो लगते ही है, तो क्‍या अर्जुन इतने वक्‍त तक सुनते ही रहे। धनुष नहीं उठाया, कई सारे बाजे बज उठे थे, युद़ध अवश्‍यंभावी था तो रुका क्‍यों रहा। गीता का जो रुप बाली द्वीप में मिला है, उसमें अस्‍सी श्‍लोक ही है? तो, सात सौ कैसे हो गए ?

ऐसा नहीं है कि मैं गीतापाठी नहीं, हर श्‍लोक कंठस्‍थ होगा मगर कई बार सोचता हूं कि इसकी रचना कब हुई? र्इसा पूर्व या बाद में ? प्रो. दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि यह गुप्‍तकाल के आसपास ही महाभारत में सन्निवेशित हुई। फाह्यान ने लिखा है कि भाइयों के बीच झगडे को लेकर लिखे गए एक बडे ग्रंथ में उपदेशात्‍मक वचनों को जोडने को लेकर उन दिनों देशवासी चर्चा करते थे…। इसी आधार पर कोसंबी ने ऐसा माना है किंतु इसका यह भी आशय है कि जब महाभारत में मिलाई गई तो यह पहले ही लिखा हुआ था और स्‍वतंत्र ग्रंथ था। सच यह भी है कि गीता रचने की परंपरा भारत के पास थी। महाभारत में ‘अनुगीता’, पांडव गीता आदि गीताएं भी हैं। विष्‍णपुराण में पृथ्‍वी गीता, विष्‍णुधर्मोत्‍तर पुराण में शंकर गीता आई है।

संयोग है कि जो श्रीकृष्‍ण गीता सुनाते हैं, वे ही अनुगीता सुनाते समय पूर्व में कहा, विस्‍मृत कर जाते हैं। जबकि वह सूर्य व वैवस्‍वत मनु के समय से ही अपनी स्‍मृति को सुनाने की बात गीता के चौथे अध्‍याय में कहते हैं…।

मैं अपने विचार के तहत कई बार गीता में एक श्‍लोक पर रुक जाता हूं, महर्षय: सप्‍त पूर्वे चत्‍वारो मनुस्‍तथा। (10, 6) गीताप्रेस वाले संस्‍करण इस पंक्ति का अर्थ सात महर्षिजन, चार उनसे पूर्व में होने वाले सनकादि और स्‍वयंभुव आदि चौदह मनु… अर्थ किया जाता है, मगर यह ठीक नहीं लगता। गीता के काल में 4 मनु की ही मान्‍यता थी, विवस्‍वान्‍मनवे प्राह मनुरिक्ष्‍वाकवे अब्रवीत्। (4, 1) बाद में यह मान्‍यता 14 हो गई। चौदह के अंक के लिए मनु लिखना भी रूढ हो गया। कुछ पुराणों में 28 मनुओं की मान्‍यता भी है। ऐसे में जब चार मनुओं की मान्‍यता थी, तब गीता को रचा गया होगा।

इसमें पूर्व में मूलश्‍लोक कम थे, ब्रह्मसूत्र, वेदांत का नाम इसमें आता ही है, तीन वेद कहे हैं, सांख्‍य का विचार प्रचारित हो चुका था परंतु पुराण नहीं बने थे, शकुनों की अपेक्षा निमित्‍तों पर भारतीय समाज में जोर था, योग के कई प्रकार साधना के सोपान बने हूए थे, अहिंसा, शील आदि के उपदेश जोर पर थे किंतु यज्ञों का प्रचार भी उचित माना गया, पीपल पूजन होता था, कुबेर जैसे यक्षों की पूजा होती थी…. ऐसे ही प्रमाणों के आधार पर गीता की रचना के काल को विचारा जा सकता है। अवतारवाद पूरी तरह स्‍थापित किया गया और कर्म को भी योग के नजरिये से देखा गया। इस पर और भी विचार हो सकता है… श्रीकृष्‍ण जुगनू

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